म्यांमार में साइबर फ्रॉड रैकेट चलाने वाले चीनी हैंडलर कंप्यूटर ज्ञान रखने वाले भारतीय युवाओं को फंसा रहे हैं। इस खेल में भारतीय एजेंट्स भी उनकी मदद कर रहे हैं। फतेहाबाद के तीन युवकों ने आरोप लगाया है कि उन्हें नौकरी के झांसे में म्यांमार ले जाकर बुरी तरह प्रताड़ित किया गया। वहां न तो बाहर जाने की अनुमति दी जाती थी और न ही स्वतंत्र रूप से किसी से बात करने दी जाती थी।
कैम्पस में कैद, मोबाइल ट्रेसिंग और प्रताड़ना
पीड़ित युवकों ने बताया कि जिस जगह उन्हें रखा जाता था वहां का मेन गेट मुश्किल से कभी खुलता था। उन्हें केवल 25-30 हजार रुपये की सैलरी दी जाती थी ताकि घरवालों को शक न हो। हर सप्ताह मोबाइल की जांच होती थी और लगातार ट्रेसिंग पर रखा जाता था। नियमों का पालन न करने पर कड़ी यातना दी जाती थी।
कंपनी के कैंपस में अलग-अलग देशों के लोगों को साथ रखा जाता था ताकि भाषा न समझ पाने के कारण वे एक-दूसरे से संपर्क न कर सकें। पासपोर्ट छीन लेने की धमकी भी दी जाती थी।
फतेहाबाद के युवकों को दोस्त ने ही फंसाया
मामले में यह भी सामने आया कि वहां फंसे युवक या तो भारी रकम देकर या अपनी जगह किसी और को बुलाकर खुद को छुड़ाते थे। पीड़ित युवकों ने बताया कि उन्हें उनके ही परिचित दोस्तों ने फंसाया था।
फतेहाबाद पुलिस ने भूना खंड के गांव धोलू निवासी राहुल की शिकायत पर केस दर्ज किया है। एफआईआर में राहुल, उसके गांव के अंकित तथा कांताखेड़ी गांव के अमरदीप का जिक्र है।
कैसे पहुंचे म्यांमार: पीड़ितों ने बताया पूरा सिलसिला
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राहुल ने बताया कि सिरसा के उसके दोस्त दीपक ने बैंकॉक में कंप्यूटर का काम दिलाने का लालच दिया।
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11 अगस्त 2025 को राहुल बैंकॉक पहुंचा जहां से कंपनी की गाड़ी उसे ले गई।
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10–15 गाड़ियां बदलकर उसे थाईलैंड बॉर्डर पार करवाकर म्यांमार भेज दिया गया।
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KK1 पार्क में मेडिकल कराने के बाद उसे KKIBS कंपनी में भेजा गया।
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यहां उसे पता चला कि चीनी हैंडलर काम करने वालों से 5–7 लाख रुपये मांगते हैं या फिर किसी और युवक को उनके स्थान पर बुलाते हैं।
अमेरिका के नागरिकों को बनाते थे निशाना
कंपनी में उन्हें डेटिंग साइट्स के जरिए 50 वर्ष से ऊपर के अमेरिकी नागरिकों से संपर्क करने को कहा जाता था। बाद में चीनी लड़की बनकर उनसे बात कर उन्हें प्यार में फंसाया जाता और डॉलर ऐंठे जाते थे।
अंकित और अमरदीप भी हुए शिकार
अंकित ने बताया कि उसे उसका उत्तराखंड निवासी दोस्त प्रीत थाईलैंड अच्छे काम और 80 हजार की सैलरी का ऑफर देकर ले गया था, लेकिन वहां पहुंचते ही वह भी साइबर फ्रॉड गैंग के चंगुल में फंस गया।
अमरदीप को 19 अक्टूबर 2024 को बैंकॉक ले जाया गया और उससे वापसी के लिए 5.50 लाख रुपये मांगे गए।
फतेहाबाद के तीनों युवक कैसे बचे?
पीड़ितों ने बताया कि उन्होंने वहां दो महीने काम किया। इसी दौरान म्यांमार आर्मी की रेड हुई, जिसके बाद सभी भागकर थाईलैंड पहुंचे। भारत की एम्बेसी ने उन्हें 10–15 दिन बाद वापस भेज दिया।
कैसे फंसाते थे भारतीय युवाओं को?
पीड़ितों का कहना है कि यह पूरा रैकेट थाईलैंड और भारतीय एजेंट्स की मिलीभगत से चलता है।
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सोशल मीडिया पर आकर्षक जॉब ऑफर दिए जाते हैं।
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युवकों को मोटी सैलरी का लालच दिया जाता है।
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वहां पहुंचते ही उनसे साइबर फ्रॉड कराना शुरू कर दिया जाता है।
एसपी का बयान
फतेहाबाद एसपी सिद्धांत जैन ने कहा कि राहुल की शिकायत पर तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। पूरा नेटवर्क खंगाला जाएगा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी। उन्होंने युवाओं को सावधान रहने और विदेश जाते समय पूरी जांच-पड़ताल करने की सलाह दी है।



