हरियाणा में 27 अप्रैल को प्रस्तावित विधानसभा का विशेष सत्र केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का अहम मंच बनता दिख रहा है।
नारी वंदन संशोधन अधिनियम के लोकसभा में गिरने के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। अब दोनों दल एक-दूसरे के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने की तैयारी में हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि मुद्दा महिलाओं के सशक्तिकरण से अधिक राजनीतिक लाभ का बन गया है।
महिला आरक्षण का विषय लंबे समय से देश की राजनीति में चर्चा का केंद्र रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना लोकतंत्र को मजबूत करता है। लेकिन जब इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो इसकी गंभीरता कम हो जाती है।
भाजपा जहां कांग्रेस को महिला विरोधी बताकर घेरना चाहती है, वहीं कांग्रेस भी इस मुद्दे पर सरकार की नीयत पर सवाल उठा रही है।
असल चिंता यह है कि क्या महिला आरक्षण वास्तव में प्राथमिकता है या सिर्फ चुनावी एजेंडा? यदि सभी दल इस मुद्दे पर गंभीर हैं, तो उन्हें संसद और विधानसभाओं में सहमति बनाकर ठोस कदम उठाने चाहिए, न कि इसे आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखना चाहिए।
हरियाणा का विशेष सत्र इस बात की परीक्षा भी होगा कि राजनीतिक दल महिलाओं के अधिकारों को लेकर कितने ईमानदार हैं।
जनता, खासकर महिला मतदाता, अब केवल बयानबाजी नहीं बल्कि ठोस परिणाम चाहती हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि राजनीतिक दल इस मुद्दे को सियासत से ऊपर उठाकर वास्तविक समाधान की दिशा में काम करें।




