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सड़क पर बचपन: योजनाओं के बावजूद कूड़ा बीनने को मजबूर बच्चे, जवाबदेही पर उठते सवाल

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देश में बच्चों को शिक्षा, पोषण और सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें अनेक योजनाएं चला रही हैं। शिक्षा का अधिकार कानून, समग्र शिक्षा अभियान, मध्याह्न भोजन योजना और विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों पर सवाल खड़े कर देती है।

शहरों और कस्बों की गलियों, पार्कों और कूड़े के ढेरों के आसपास आज भी ऐसे बच्चे दिखाई देते हैं जो स्कूल की किताबों के बजाय प्लास्टिक की बोतलें, कबाड़ और अन्य पुनर्चक्रण योग्य सामग्री बीनते नजर आते हैं। इनमें कई बच्चे दिव्यांग या विशेष आवश्यकता वाले भी होते हैं। ऐसे बच्चों का बचपन शिक्षा और खेलकूद के बजाय जीविका की मजबूरी में बीत रहा है।

कार्रवाई दुकानों पर, लेकिन सड़कों पर क्यों नहीं?

बाल संरक्षण तंत्र और श्रम विभाग अक्सर दुकानों, ढाबों और प्रतिष्ठानों पर छापेमारी कर बाल श्रमिकों को मुक्त कराते हैं। नाबालिग बच्चों को काम पर रखने वाले प्रतिष्ठान संचालकों के खिलाफ कार्रवाई भी की जाती है। लेकिन सवाल यह है कि सड़कों पर कूड़ा बीनने वाले बच्चों तक यह तंत्र कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कूड़ा बीनने वाले बच्चे अक्सर प्रशासन की नजर से ओझल रह जाते हैं। ऐसे बच्चों की नियमित पहचान, सर्वेक्षण और पुनर्वास की व्यवस्था पर्याप्त नहीं दिखाई देती। नतीजतन कई बच्चे वर्षों तक शिक्षा व्यवस्था से बाहर ही रह जाते हैं।

योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच अंतर

विशेषज्ञों के अनुसार समस्या केवल योजनाओं की कमी नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की भी है। कई परिवार अत्यंत गरीब हैं और बच्चों की आय पर निर्भर रहते हैं। वहीं कुछ मामलों में अभिभावकों की जागरूकता की कमी, प्रवासी परिवारों की अस्थायी जीवनशैली और दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष सुविधाओं का अभाव भी बड़ी बाधा बनता है।

कूड़ा बीनने वाले बच्चों की पहचान कर उन्हें स्कूलों से जोड़ने, आवश्यक दस्तावेज बनवाने और परिवारों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ दिलाने की जिम्मेदारी विभिन्न विभागों के बीच बंटी हुई है। लेकिन विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण कई बच्चे सहायता से वंचित रह जाते हैं।

दिव्यांग बच्चों के लिए अतिरिक्त चुनौती

मूक-बधिर और अन्य दिव्यांग बच्चों के मामले में स्थिति और गंभीर हो जाती है। ऐसे बच्चों को सामान्य शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने के लिए विशेष शिक्षकों, सांकेतिक भाषा विशेषज्ञों और समावेशी शिक्षा की आवश्यकता होती है। यदि यह सुविधाएं उपलब्ध नहीं हों तो परिवार उन्हें स्कूल भेजने के बजाय किसी न किसी तरह आजीविका में लगा देते हैं।

जवाबदेही तय करने की जरूरत

बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का मानना है कि यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक बच्चे कूड़ा बीनते दिखाई दे रहे हैं तो यह केवल परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की भी विफलता है। बाल संरक्षण इकाइयों, शिक्षा विभाग, स्थानीय निकायों और सामाजिक न्याय विभाग को संयुक्त रूप से ऐसे बच्चों की पहचान और पुनर्वास के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

बड़ा सवाल

जब सरकार का लक्ष्य हर बच्चे को शिक्षा और सुरक्षित बचपन उपलब्ध कराना है, तब सड़कों पर कूड़ा बीनते बच्चों की मौजूदगी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या योजनाएं जरूरतमंद बच्चों तक नहीं पहुंच पा रही हैं? क्या संबंधित विभागों की निगरानी पर्याप्त नहीं है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या ऐसे बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने के लिए जमीनी स्तर पर पर्याप्त प्रयास किए जा रहे हैं?

इन सवालों के जवाब तलाशना और जिम्मेदार विभागों की जवाबदेही तय करना जरूरी है, क्योंकि किसी भी समाज की प्रगति का वास्तविक पैमाना उसके सबसे कमजोर बच्चों की स्थिति से तय होता है।

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