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बच्चों में कर्णस्त्राव का बड़ा कारण बनी नाक-कान की छोटी नली: प्रो. संगीता सालवी

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योग और आयुर्वेद से दंत चिकित्सा में नई दिशा, श्रीकृष्ण आयुष विश्वविद्यालय में CME का दूसरा दिन संपन्न
कुरुक्षेत्र, 16 सितंबर : श्रीकृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के शालाक्य तंत्र विभाग द्वारा आयोजित सतत चिकित्सा शिक्षा (CME) कार्यक्रम के दूसरे दिन मंगलवार को विशेषज्ञों ने पारंपरिक आयुर्वेद और आधुनिक तकनीकों के समन्वय पर जोर दिया।
प्रमुख वक्ता प्रो. संगीता सालवी (तिलक आयुर्वेदिक कॉलेज, महाराष्ट्र) ने बच्चों में कर्णस्त्राव की समस्या पर प्रकाश डालते हुए बताया कि नाक और कान को जोड़ने वाली छोटी नली संक्रमण को तेजी से फैलने देती है, जिससे 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों में यह समस्या आम हो जाती है। उन्होंने चेताया कि बार-बार जुकाम, खांसी और बुखार को नजरअंदाज न करें, क्योंकि ये लक्षण कर्णस्त्राव के संकेत हो सकते हैं।
कार्यक्रम के पहले सत्र में प्रतिभागियों को एंडोस्कोपी मशीन की लाइव ट्रेनिंग दी गई, जिसमें मुख और कंठ रोगों के निदान की सूक्ष्म तकनीकों को समझाया गया।
दूसरे सत्र में वैद्य हरिद्रा दवे (सेवानिवृत्त प्रोफेसर, अखंडानंद आयुर्वेदिक कॉलेज, गुजरात) ने योग क्रिया ‘जालंधर बंध’ के माध्यम से बिना इंजेक्शन दांत निकालने की तकनीक का प्रदर्शन किया। उन्होंने बताया कि एक्यूप्रेशर और आयुर्वेदिक सिद्धांतों के साथ योग का वैज्ञानिक प्रयोग न केवल दर्द रहित उपचार संभव बनाता है, बल्कि मरीजों का भय भी कम करता है।
कार्यक्रम में प्रो. आशीष मेहता, प्रो. आशु, प्रो. मनोज कुमार तंवर समेत विश्वविद्यालय के शिक्षक और शोधार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। प्रतिभागियों ने माना कि ऐसे CME कार्यक्रम चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा देने के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान को भी समृद्ध करते हैं।

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