कुरुक्षेत्र, 29 अक्टूबर।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित चार दिवसीय राज्य स्तरीय रत्नावली उत्सव का दूसरा दिन संस्कृति और मानवाधिकारों के गहन संदेश से सराबोर रहा। हरियाणा मानव अधिकार आयोग के चेयरमैन एवं पूर्व न्यायाधीश ललित बतरा ने मुख्य अतिथि के रूप में कहा कि रत्नावली केवल कला का नहीं, बल्कि मानव गरिमा, पहचान और अधिकारों का भी उत्सव है।
उन्होंने कहा कि हरियाणा की यह परंपरा न केवल राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करती है, बल्कि हमारी रचनाशीलता और कलात्मक भावना की पहचान भी बन चुकी है। ललित बतरा ने कहा कि संस्कृति और मानवाधिकार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं—जहां संस्कृति फलती-फूलती है, वहां मानवाधिकारों को अभिव्यक्ति मिलती है, और जहां अधिकारों की रक्षा होती है, वहां संस्कृति स्वतंत्र रूप से विकसित होती है।
उन्होंने हस्तशिल्प मेले का अवलोकन करते हुए स्कूली विद्यार्थियों से बातचीत की और उनके उत्साह की सराहना की। उन्होंने कहा कि यहाँ प्रस्तुत हर नृत्य, गीत, नाटक और चित्रकला हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक जीवन में समान भागीदारी के अधिकार का प्रतीक है, जो भारतीय संविधान और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में निहित है।
बतरा ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 (ए)(ई) हर नागरिक को यह कर्तव्य सौंपता है कि वह सभी भारतवासियों में धार्मिक, भाषायी और प्रादेशिक विविधताओं से ऊपर उठकर सद्भाव और भाईचारे की भावना को बढ़ावा दे। रत्नावली इसी संदेश को जीवंत करता है कि संस्कृति स्वयं एक मानव अधिकार है, और इसके संरक्षण से हम समाज में गरिमा, सम्मान और सामाजिक सद्भाव को सशक्त बनाते हैं।
समारोह में कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा, कुलसचिव डॉ. वीरेन्द्र पाल, छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. ए.आर. चौधरी, युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक प्रो. विवेक चावला, लोक संपर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया सहित कई डीन, निदेशक, शिक्षक, विद्यार्थी और कर्मचारी उपस्थित रहे।




