रोहतक।
रोहतक की सुनारिया जेल में बंद डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर 40 दिन की पैरोल दी गई है। साध्वियों के यौन शोषण और पत्रकार हत्या जैसे मामलों में सजा काट रहा राम रहीम पैरोल की अवधि के दौरान सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के मुख्यालय में रहेगा।
2017 से जेल में बंद है राम रहीम
गुरमीत राम रहीम अगस्त 2017 से जेल में है। पंचकूला की सीबीआई अदालत ने उसे दो साध्वियों से दुष्कर्म के मामलों में दोषी करार देते हुए 20 साल की कैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद जनवरी 2019 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्या मामले में उसे उम्रकैद हुई। वहीं डेरा मैनेजर रणजीत सिंह हत्याकांड में अक्टूबर 2021 में सीबीआई कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा दी थी, हालांकि बाद में हाईकोर्ट से उसे इस केस में राहत मिल गई।
अब तक 14 बार मिल चुकी है रिहाई
रेप केस में सजा मिलने के बाद यह 15वां मौका है जब राम रहीम पैरोल या फरलो पर जेल से बाहर आएगा। इससे पहले वह 15 अगस्त को जन्मदिन मनाने के लिए भी पैरोल पर बाहर आया था। सुनारिया जेल से वह अब तक 14 बार बाहर आ चुका है।
हाल के महीनों में भी मिली पैरोल
इससे पहले अप्रैल महीने में राम रहीम को 21 दिन की पैरोल दी गई थी। वहीं जनवरी में दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक एक सप्ताह पहले उसे 30 दिन की पैरोल मिली थी। उस दौरान भी वह सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय में ही रहा था। कुछ अवसरों पर वह उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित डेरा आश्रम में भी ठहर चुका है।
समर्थकों से सीधी मुलाकात पर रोक
पैरोल के दौरान राम रहीम को डेरा परिसर में समर्थकों की भीड़ जुटाने की अनुमति नहीं है। हालांकि वह वीडियो संदेश और अन्य वर्चुअल माध्यमों के जरिए अपने अनुयायियों से संपर्क कर सकता है। पहले भी सिरसा पहुंचने के बाद उसने अपने फॉलोअर्स के लिए वीडियो संदेश जारी किए थे।
सजा के बाद भड़की थी हिंसा
अगस्त 2017 में दोषसिद्धि के बाद राम रहीम के समर्थकों ने पंचकूला और सिरसा में भारी हिंसा की थी। इन घटनाओं में 40 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। हालात बिगड़ने पर राम रहीम को पंचकूला से हेलिकॉप्टर के जरिए रोहतक की सुनारिया जेल ले जाया गया था।
पैरोल और फरलो का फर्क
पैरोल विशेष परिस्थितियों में दी जाती है, जैसे परिवार में किसी की मृत्यु, गंभीर बीमारी या अन्य जरूरी कारण। यह रेगुलर और कस्टडी दो तरह की होती है। रेगुलर पैरोल में कैदी स्वतंत्र रहता है, जबकि कस्टडी पैरोल में पुलिस निगरानी में रहता है।
फरलो कैदी का कानूनी अधिकार माना जाता है और इसके लिए किसी विशेष कारण की आवश्यकता नहीं होती, हालांकि राज्यों के नियम अलग-अलग हो सकते हैं।




