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ज्ञान का अभिमान नहीं, बल्कि अभिमान का बोध आवश्यक : स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज

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कुरुक्षेत्र, 6 जनवरी।
गीता ज्ञान संस्थानम में आयोजित पांच दिवसीय गीता चिंतन शिविर के दौरान गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने ज्ञान योग की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य को ज्ञान का अभिमान नहीं होना चाहिए, बल्कि अपने भीतर उत्पन्न होने वाले अभिमान का ज्ञान होना आवश्यक है। जब व्यक्ति अपने अहंकार को पहचान लेता है, तभी वह सच्चे ज्ञान की ओर अग्रसर होता है।

स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने तत्व ज्ञान की अनुभूति और उसके लक्षणों का उल्लेख करते हुए कहा कि वास्तविक ज्ञान मनुष्य को विनम्र, सहज और करुणामय बनाता है। अहंकार से सावधान करते हुए उन्होंने कहा कि जब मन में अभिमान उत्पन्न हो, तो व्यक्ति को दो स्थानों—अस्पताल और श्मशान—का स्मरण अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इससे जीवन की नश्वरता का बोध होता है।

ज्ञान योग की साधना में साक्षी भाव को अनिवार्य बताते हुए गीता मनीषी ने कहा कि साधक को यह भावना रखनी चाहिए कि कर्ता मैं नहीं हूं, सब कुछ प्रभु की कृपा से होता है। यही दृष्टि मनुष्य को बंधनों से मुक्त कर आत्मिक शांति की ओर ले जाती है।

उन्होंने सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण की व्याख्या करते हुए बताया कि सतोगुण व्यक्ति को ज्ञान और परोपकार की दिशा में ले जाता है, रजोगुण लोभ को बढ़ाता है, जबकि तमोगुण अज्ञानता को जन्म देता है। जब साधक तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है, तब वह परम आनंद की अनुभूति करता है।


आत्मा को परमात्मा में स्थिर करने का सशक्त माध्यम है ध्यान : स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज

कुरुक्षेत्र, 6 जनवरी।
गीता ज्ञान संस्थानम में आयोजित विशेष दो दिवसीय ध्यान सत्र को संबोधित करते हुए गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि ध्यान जीवन के लिए उतना ही आवश्यक है, जितना मोबाइल के लिए चार्जर। जैसे मोबाइल पूरी तरह चार्ज होने पर दिनभर सुचारू रूप से कार्य करता है, उसी प्रकार नियमित ध्यान से मनुष्य का तन, मन और बुद्धि सकारात्मक ऊर्जा, संतुलन और एकाग्रता के साथ कार्य करते हैं। इस ध्यान सत्र में करीब 300 से अधिक साधकों ने भाग लिया।

स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने ध्यान की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा कि ध्यान में बैठकर व्यक्ति को बाहरी संसार की बजाय अपने भीतर झांकना चाहिए, क्योंकि शांति, शक्ति, समाधान और परमात्मा—all कुछ हमारे भीतर ही विद्यमान हैं। जब साधक बाहरी विषयों से हटकर अंतरमन की ओर दृष्टि करता है, तभी वास्तविक ध्यान आरंभ होता है।

उन्होंने कहा कि मन स्वभाव से चंचल होता है और बार-बार भटकता है, लेकिन ध्यान साधना का उद्देश्य यही है कि जब मन विचलित हो, तो उसे प्रेमपूर्वक पुनः आत्मा और परमात्मा में स्थिर किया जाए। यही अभ्यास मनुष्य को आत्मबोध की ओर ले जाता है।

गीता मनीषी ने साधकों से आग्रह किया कि वे ध्यान को अपने जीवन का अनिवार्य अंग बनाएं, क्योंकि ध्यान ही वह साधन है जो मनुष्य को भीतर की दिव्यता से जोड़कर जीवन को संतुलित, शांत, सकारात्मक और सार्थक बनाता है। ध्यान सत्र में उपस्थित साधकों ने गहन शांति, आत्मिक संतोष और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव किया।

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