इंसाइट न्यूज 24, कुरुक्षेत्र, 10 सितम्बर : “अनुवाद केवल शब्दों का नहीं, बल्कि संस्कृति की आत्मा का सेतु है।” इसी विचार के साथ कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय बहुभाषी अनुवाद कार्यशाला का शुभारंभ हुआ, जिसमें उत्तर भारत की आठ भाषाओं के अनुवादकों, विद्वानों और शोधार्थियों ने भाग लिया।
कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि भाषा किसी भी संस्कृति का प्रतिबिंब होती है और अनुवाद के माध्यम से हम विविध सांस्कृतिक भावनाओं को एक-दूसरे तक पहुँचा सकते हैं। उन्होंने कहा, “AI टूल्स जैसे ChatGPT अनुवाद में सहायक हो सकते हैं, लेकिन भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक संवेदनशीलता केवल एक अनुवादक ही दे सकता है।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के प्रधान डॉ. माधव कौशिक ने कहा, “भारत की सबसे बड़ी ताकत इसकी भाषाई विविधता है। अनपढ़ लोगों ने भी संस्कृति को बचाने में अहम भूमिका निभाई है। अनुवादक वह पीड़ा भी व्यक्त करते हैं जो शब्दों से परे होती है।”
कार्यशाला में डोगरी, अंग्रेज़ी, हिंदी, कश्मीरी, पंजाबी, राजस्थानी, संस्कृत और उर्दू भाषाओं को केंद्र में रखा गया है। पंजाबी सलाहकार बोर्ड के संयोजक प्रो. रवेल सिंह ने कहा, “हर भाषा के पीछे एक सांस्कृतिक विरासत होती है, जिसे अनुवादक संवेदनशीलता से पाठकों तक पहुँचाते हैं।”
प्रख्यात कथाकार केसरा राम ने अनुवाद को संस्कृति जोड़ने वाला माध्यम बताया, जबकि कुलसचिव डॉ. वीरेन्द्र पाल ने कहा कि ऐसी कार्यशालाएँ विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण को समृद्ध करती हैं।
कार्यक्रम में मंच संचालन डॉ. लता खेड़ा ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. देवेन्द्र ने प्रस्तुत किया। कार्यशाला 12 सितम्बर तक चलेगी, जिसमें साहित्यिक रचनाओं का अनुवाद कर उन्हें नई भाषाई पहचान दी जाएगी।




